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बागवानी में लोकप्रिय हो रहे हैं इंग्लैंड से लौटे नवदीप

युवा किसान नवदीप गोलेच्छा की कहानी इन दिनों उन सब किसानों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन रही है, जो गांव छोड़कर शहरों की ओर रुख़ करते हैं, विदेशों में जाकर जॉब करते हैं और वहीं बस जाते  हैं।

नवदीप अपनी कहानी कहते हैं,“मैंने  स्कूल की पढ़ाई जोधपुर से की। ग्रैजुएशन के लिए मुंबई चला गया, वहां से मैंने ‛बैचलर ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज’ की और मास्टर्स के लिए इंग्लैंड चला गया। वहीं से मैंने ‛फाइनेंसियल इकोनॉमिक्स’ में एमएससी की। कॉलेज टॉपर रहने के कारण ग्रेजुएट स्कीम के तहत वहां ‛रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड’ में मेरा चयन हो गया। मोटी तनख्वाह थी, सब सुख सुविधाएं थीं पर मन नहीं लगा। मैं स्वदेश लौट आया।”

स्वदेश वापसी पर पिता की खाली पड़ी ज़मीन पर अपनी शिक्षा और मेहनत के बलबूते पर कामयाबी की इबारत लिखने की सोची। साढ़े 3 साल की खेतीबाड़ी ने उन्हें वो मक़ाम दिलवाया, जिसकी कभी उन्होंने सोची भी नहीं थी।

इन दिनों वे जोधपुर से 170 किलोमीटर दूर सिरोही में अपने 150 एकड़ के ‛नेचुरा फार्म’ को विकसित करने में जुटे हैं। फ़िलहाल 30 एकड़ में अनार, पपीता और नींबू की खेती कर रहे हैं। धीरे-धीरे उनकी पहचान अनार उत्पादक किसान के रुप में हो रही है।

बातचीत को आगे बढ़ाते हुए नवदीप बताते हैं,“घर-परिवार में कोई भी कृषि से नहीं जुड़ा था। किसानों से मिला तो उन्होंने गेहूं और रायड़े की खेती की सलाह दी, बोले तुम नए हो, तुम्हारे लिए यही ठीक है। इसमें ज्यादा रिस्क भी नहीं और फिक्स इनकम हो जाएगी। अंतत मैंने अनार की खेती का मन बनाया।”

सतत सीखते रहने की प्रक्रिया के चलते आगे बढ़ता गया। मेरे खेत के अनार की चर्चा सुनकर ‛राष्ट्रीय अनार अनुसंधान केंद्र’, सोलापुर की निदेशक डॉ ज्योत्स्ना शर्मा जी मेरे फार्म की विजिट करने के लिए सिरोही आईं।

गुणवत्ता से समझौता न करें किसान…
अनार के भाव इस साल कम रहे, इस साल 20 रुपए किलो में भी अनार बिके और 60 रूपए किलो में भी। यह फ़र्क़ आपके उत्पाद की गुणवत्ता के कारण है। अनार की गुणवत्ता में उसकी साइज और कलर का सबसे बड़ा रोल है।

‛थीनिंग’ क्या है? इसे भी समझना होगा।
यदि आपके पौधे पर 200 फल लगे हैं तो मुझे पौधे की साइज और उम्र देखकर यह तय करना है कि कौन से 70, 80 या 90 फ्रूट मुझे रखने हैं, ताकि मुझे फ्रूट की ऑप्टिमम साइज मिल सके।

यदि मेरा पौधा 2 साल का है और उस पर 100 फल हैं और मैं 100 के 100 फल ले लूंगा तो एक फल 100 ग्राम का ही होगा। ऐसा करने पर मुझे उसके सही दाम नहीं मिलेंगे। ऐसा करने की बजाय  मैं इस पर 30, 40, 50 फल ही रखूं जो 200 से 250 ग्राम तक के हों, तो मुझे मार्केट में इनकी अच्छी वैल्यू मिलेगी।

उन्होंने साढ़े 3 एकड़ में पपीते की खेती भी की है। पपीता ‛रेड लेडी 786’ वैरायटी का है। पपीते पर उनका दूसरा ट्रायल है। पिछली बार उन्हें प्रति पौधा 80 से 85 किलो फ्रूट मिला था। इस बार वे मल्चिंग पेपर पर पपीते की खेती कर रहे हैं, मल्चिंग के अंदर ही इनलाइन ड्रिप इरिगेशन भी है।

साथ ही 100% जैविक कागजी वैरायटी के नींबू का बगीचा भी उन्होंने तैयार किया है। यह नींबू 15 से 20 दिन तक खराब नहीं होता। इस साल जुलाई में वे 20 बीघा में नींबू के बगीचे को बढ़ा रहे हैं। ‘केन्द्रीय लिंबूवर्गीय संशोधन केंद्र’, नागपुर की ‛एनआरसीसी 7’ एवं ‛8’ वैरायटी को लगाने का मन बनाया है।

प्रस्तुति : मोईनुद्दीन चिश्ती
(लेखक कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार हैं)

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